Monday, 24 December 2012

कविता

आखिर निकल ही गया
21 दिसंबर का वो मनहूस दिन,

धरी की धरी रह गयी
सारी आशंकायेँ,
और
भविष्यवाणियां भी ।

सबके चेहरोँ पर खुशी है
आखिर खत्म होने से
बच गयी धरती,

लेकिन
इंसान के अंदर के,
इंसान के
खत्म हो जाने का
शोक भला कौन मनाता है ?

-बी. एल. 'पारस'