मराठी के बाद हिन्दी में दलित साहित्य ने अपना एक अलग मुकाम तय किया है | स्वानुभूत पीड़ाओं की आग में तपने की वजह से दलित साहित्यकारों की रचनाएं यथार्थवाद के सर्वाधिक नजदीक लगती हैं | पिछले कुछ दशकों से निरन्तर प्रकाशित हो रहे दलित चेतना के कविता-कहानी संग्रहों और आत्म कथाओं ने हिन्दी साहित्य को एक नयी दिशा दी है और यह एक आन्दोलन का रूप ले चुका है | इसी आन्दोलन में एक और अध्याय जोड़ा है अरविन्द भारती ने अपने कविता संग्रह 'युद्ध अभी जारी है' के माध्यम से |
वर्ण और जाति के आधार पर भेदभाव भारतीय समाज का अखंडनीय हिस्सा रहा है | संविधान भले ही वर्षों पहले किसी भी प्रकार के भेदभाव को गैर कानूनी घोषित कर चुका हो, लेकिन यह कड़वा सत्य है कि आज भी भारतीय जनमानस जातिवाद में आकंठ डूबा हुआ है | संग्रह की पहली ही कविता 'कैद में हूँ' में कवि लिखता है-
"कभी मेरे आगे/कभी मेरे पीछे/कभी साथ-साथ चलती है/मैं दो कदम बढाता हूँ/वो चार कदम चलती है/जहाँ नही होता मौजूद/वहां भी पहुँच जाती है/जाति मेरी |"
इस कविता संग्रह में सम्मिलित रचनाएं छूआछूत के अलावा जाति व्यवस्था के हर पहलू को पाठकों के समक्ष रखती है | जाति बम, प्रेम की दुश्मन जाति, गुनहगार, जाति का नाग, दुर्घटना, कुकुर कहीं के, बहिष्कार, अछूत आदि कविताएं इसका अच्छा उदाहरण है | संग्रह शीर्षक कविता 'युद्ध अभी जारी है' एक उत्कृष्ट कविता है, जिसमें वेदना और संघर्ष एक साथ प्रतिध्वनित होते हैं | भारती बड़े सधे हुए शब्दों में हार मानने की बजाय स्वयं के स्वाभिमान को कुछ इस तरह प्रकट करते हैं-
"जैसे ही पता चलती है/जाति मेरी/उनके चेहरे की रंगत/डूबते सूरज की तरह/खो जाती है क्षितिज में कहीं/...बह जाती है योग्यता मेरी/जैसे बहता है पानी/दरिया में कहीं/शुरु होता है एक w युद्ध/वो सभी झुंड में हैं/और मैं अकेला/युद्ध अभी जारी है |"
धर्म और ईश्वर के नाम पर पोषित विभिन्न मान्यताओं द्वारा थोपी गई गुलामी को कवि समाज की अवनति का मुख्य कारण मानता है | धंधा, नही मिला, पत्थर, वो भगवान बनाता है, मनु का तिलिस्म आदि कविताएं इन्ही मान्यताओं की पोल खोलती है | शोषक की सहानुभूति अथवा हृदय परिवर्तन से उन्नति का इंतजार करते-करते सदियां गुजर गई, लेकिन सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था का ताना-बाना ज्यों का त्यों है | कवि का ही नही, यह पूरे दलित-आदिवासी समाज का आक्रोश है, जो 'धर्म का पेड़' कविता में गूँजता है-
"धर्म के पेड़ पर/उगती है जातियां/तना,शाखाओं,पत्तियों सी/फैलती है जातियां/कितना भी काटो/शाखाओं को काटने से/नही कट पाती है जातियां/...जड़ में मट्ठा डाल/उखाड़ फेंकना होगा पेड़ को |"
ठीक इसी तरह, ईश्वर के नाम पर हो रहे नित नये ढोंग और वंचितों की उपेक्षा से क्षुब्ध हो कवि 'सुनों ईश्वर' कविता में लिखता है-
"सुनों ईश्वर/सड़ चुकी है तुम्हारी लाश/पड़ चुके हैं उसमें कीड़े/बदबू के मारे फटा जा रहा है/सर मेरा/मैंनें उतार फेंका है/तुम्हें कंधे से/कर दिया है/अग्नि के हवाले |"
धर्म की ओट में जानवरों की पूजा और मनुष्य के प्रति हेय दृष्टिकोण कवि को अखरता है | तथाकथित धर्म ध्वजाधारी लोग गाय का सींग-पूँछ कटने पर तो देश व्यापी विरोधी प्रदर्शन करने निकल पड़ते हैं लेकिन आये दिन होते दलित नरसंहारों-उत्पीड़न मामलों पर विरोध का एक शब्द ऐसे लोगों के मुँह से नही निकलता | इसी दोगलेपन पर चोट करती है 'मानवीय भावनाएं' कविता-
"चौपाया कटने पर/रोते हो जार-जार/...तुम्हारी संवेदनशीलता/चली जाती है घास चरने/रौंदे जाते हैं श्यामवर्णीय/जब पैरों तले/कर दिये जाते हैं/जिंदा ही अग्नि के हवाले |"
ऐसा ही दोगलापन दलित महिलाओं को नित सहन करना पड़ता है | जुल्म-ज्यादती तो जाति देखकर होती ही है, न्याय भी जाति जाने बगैर नही होता | एक पीड़ित सवर्ण लड़की पूलिस-मीडिया-प्रशासन के लिए पल भर में देश की बेटी बन जाती है, वहीं एक पीड़ित दलित-आदिवासी लड़की को एफआईआर तक के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है | 'विद्रोहिणी' कविता इसी पीड़ा को शब्द देती है-
"उसने निर्भया कांड में/जुल्म के खिलाफ/लोगों में आग देखी थी/मीडिया का सहयोग देखा था/पर/वो समझ नही पा रही थी/इस लड़ाई में कोई क्यों उसके साथ नही ?"
भारतीय सभ्यता-संस्कृति पर कवि को भी गर्व है, लेकिन वर्ण व्यवस्था और जातिवाद के पोषक लोगों को बेनकाब करते हुए कवि 'दाग' कविता में लिखा है-
"सर ऊपर उठाकर/छाती फुलाकर कहते फिरते हो/हमारी सभ्यता और संस्कृति विश्व में सर्वश्रेष्ठ है/सुनों/तुम्हारी पीठ पर/एक दाग है/बहुत बड़ा |“
इस तरह संग्रह की अधिकांश कविताएं देश की सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था के खोखलापन को उजागर करती हुई पाठक को सोचने पर विवश करती है | कवि ने यह संग्रह ही बाबा साहब डॉ.आम्बेडकर और अपने पिता को समर्पित किया है | बाबा साहब को नमन, टांग दिया है खूँटी से, जय भीम आदि कविताएं इसी कृतज्ञता की बानगी है |
अरविन्द भारती की कविताओं में न तो भाषायी कलिष्टता है और न ही कोई छद्म चमत्कार | बिना किसी भारी-भरकम शब्दावली के भारती अपनी बात को सहज ढंग से कहते है | भाषा जितनी सरल है, संवेदना उतनी ही गहरी | नि:संदेह, कवि ने यह संग्रह रचकर आधुनिकता और प्रगतिशीलता के इस दौर में भी उपेक्षित दलित-आदिवासी वर्ग की पीड़ा को पाठकों के समक्ष रखा है | आने वाले समय में कवि और अधिक पैनेपन के साथ अपने पाठकों से मुखातिब होगा, ऐसी अपेक्षा है |
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युद्ध अभी जारी है (कविता संग्रह)/अरविन्द भारती/वर्ष-2017/पृष्ठ-96/मूल्य-100 रुपये/बोधि प्रकाशन, जयपुर
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-बी.एल.पारस
गंगानगर (राज.)
एक नवोदित रचनाकार,मंच संचालक,कॅरियर विशेषज्ञ के साथ ही राज.शिक्षा विभाग में अंग्रेजी व्याख्याता के पद पर कार्यरत !
Friday, 27 October 2017
व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर करता संग्रह
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