मराठी के बाद हिन्दी में दलित साहित्य ने अपना एक अलग मुकाम तय किया है | स्वानुभूत पीड़ाओं की आग में तपने की वजह से दलित साहित्यकारों की रचनाएं यथार्थवाद के सर्वाधिक नजदीक लगती हैं | पिछले कुछ दशकों से निरन्तर प्रकाशित हो रहे दलित चेतना के कविता-कहानी संग्रहों और आत्म कथाओं ने हिन्दी साहित्य को एक नयी दिशा दी है और यह एक आन्दोलन का रूप ले चुका है | इसी आन्दोलन में एक और अध्याय जोड़ा है अरविन्द भारती ने अपने कविता संग्रह 'युद्ध अभी जारी है' के माध्यम से |
वर्ण और जाति के आधार पर भेदभाव भारतीय समाज का अखंडनीय हिस्सा रहा है | संविधान भले ही वर्षों पहले किसी भी प्रकार के भेदभाव को गैर कानूनी घोषित कर चुका हो, लेकिन यह कड़वा सत्य है कि आज भी भारतीय जनमानस जातिवाद में आकंठ डूबा हुआ है | संग्रह की पहली ही कविता 'कैद में हूँ' में कवि लिखता है-
"कभी मेरे आगे/कभी मेरे पीछे/कभी साथ-साथ चलती है/मैं दो कदम बढाता हूँ/वो चार कदम चलती है/जहाँ नही होता मौजूद/वहां भी पहुँच जाती है/जाति मेरी |"
इस कविता संग्रह में सम्मिलित रचनाएं छूआछूत के अलावा जाति व्यवस्था के हर पहलू को पाठकों के समक्ष रखती है | जाति बम, प्रेम की दुश्मन जाति, गुनहगार, जाति का नाग, दुर्घटना, कुकुर कहीं के, बहिष्कार, अछूत आदि कविताएं इसका अच्छा उदाहरण है | संग्रह शीर्षक कविता 'युद्ध अभी जारी है' एक उत्कृष्ट कविता है, जिसमें वेदना और संघर्ष एक साथ प्रतिध्वनित होते हैं | भारती बड़े सधे हुए शब्दों में हार मानने की बजाय स्वयं के स्वाभिमान को कुछ इस तरह प्रकट करते हैं-
"जैसे ही पता चलती है/जाति मेरी/उनके चेहरे की रंगत/डूबते सूरज की तरह/खो जाती है क्षितिज में कहीं/...बह जाती है योग्यता मेरी/जैसे बहता है पानी/दरिया में कहीं/शुरु होता है एक w युद्ध/वो सभी झुंड में हैं/और मैं अकेला/युद्ध अभी जारी है |"
धर्म और ईश्वर के नाम पर पोषित विभिन्न मान्यताओं द्वारा थोपी गई गुलामी को कवि समाज की अवनति का मुख्य कारण मानता है | धंधा, नही मिला, पत्थर, वो भगवान बनाता है, मनु का तिलिस्म आदि कविताएं इन्ही मान्यताओं की पोल खोलती है | शोषक की सहानुभूति अथवा हृदय परिवर्तन से उन्नति का इंतजार करते-करते सदियां गुजर गई, लेकिन सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था का ताना-बाना ज्यों का त्यों है | कवि का ही नही, यह पूरे दलित-आदिवासी समाज का आक्रोश है, जो 'धर्म का पेड़' कविता में गूँजता है-
"धर्म के पेड़ पर/उगती है जातियां/तना,शाखाओं,पत्तियों सी/फैलती है जातियां/कितना भी काटो/शाखाओं को काटने से/नही कट पाती है जातियां/...जड़ में मट्ठा डाल/उखाड़ फेंकना होगा पेड़ को |"
ठीक इसी तरह, ईश्वर के नाम पर हो रहे नित नये ढोंग और वंचितों की उपेक्षा से क्षुब्ध हो कवि 'सुनों ईश्वर' कविता में लिखता है-
"सुनों ईश्वर/सड़ चुकी है तुम्हारी लाश/पड़ चुके हैं उसमें कीड़े/बदबू के मारे फटा जा रहा है/सर मेरा/मैंनें उतार फेंका है/तुम्हें कंधे से/कर दिया है/अग्नि के हवाले |"
धर्म की ओट में जानवरों की पूजा और मनुष्य के प्रति हेय दृष्टिकोण कवि को अखरता है | तथाकथित धर्म ध्वजाधारी लोग गाय का सींग-पूँछ कटने पर तो देश व्यापी विरोधी प्रदर्शन करने निकल पड़ते हैं लेकिन आये दिन होते दलित नरसंहारों-उत्पीड़न मामलों पर विरोध का एक शब्द ऐसे लोगों के मुँह से नही निकलता | इसी दोगलेपन पर चोट करती है 'मानवीय भावनाएं' कविता-
"चौपाया कटने पर/रोते हो जार-जार/...तुम्हारी संवेदनशीलता/चली जाती है घास चरने/रौंदे जाते हैं श्यामवर्णीय/जब पैरों तले/कर दिये जाते हैं/जिंदा ही अग्नि के हवाले |"
ऐसा ही दोगलापन दलित महिलाओं को नित सहन करना पड़ता है | जुल्म-ज्यादती तो जाति देखकर होती ही है, न्याय भी जाति जाने बगैर नही होता | एक पीड़ित सवर्ण लड़की पूलिस-मीडिया-प्रशासन के लिए पल भर में देश की बेटी बन जाती है, वहीं एक पीड़ित दलित-आदिवासी लड़की को एफआईआर तक के लिए जद्दोजहद करनी पड़ती है | 'विद्रोहिणी' कविता इसी पीड़ा को शब्द देती है-
"उसने निर्भया कांड में/जुल्म के खिलाफ/लोगों में आग देखी थी/मीडिया का सहयोग देखा था/पर/वो समझ नही पा रही थी/इस लड़ाई में कोई क्यों उसके साथ नही ?"
भारतीय सभ्यता-संस्कृति पर कवि को भी गर्व है, लेकिन वर्ण व्यवस्था और जातिवाद के पोषक लोगों को बेनकाब करते हुए कवि 'दाग' कविता में लिखा है-
"सर ऊपर उठाकर/छाती फुलाकर कहते फिरते हो/हमारी सभ्यता और संस्कृति विश्व में सर्वश्रेष्ठ है/सुनों/तुम्हारी पीठ पर/एक दाग है/बहुत बड़ा |“
इस तरह संग्रह की अधिकांश कविताएं देश की सामाजिक-धार्मिक व्यवस्था के खोखलापन को उजागर करती हुई पाठक को सोचने पर विवश करती है | कवि ने यह संग्रह ही बाबा साहब डॉ.आम्बेडकर और अपने पिता को समर्पित किया है | बाबा साहब को नमन, टांग दिया है खूँटी से, जय भीम आदि कविताएं इसी कृतज्ञता की बानगी है |
अरविन्द भारती की कविताओं में न तो भाषायी कलिष्टता है और न ही कोई छद्म चमत्कार | बिना किसी भारी-भरकम शब्दावली के भारती अपनी बात को सहज ढंग से कहते है | भाषा जितनी सरल है, संवेदना उतनी ही गहरी | नि:संदेह, कवि ने यह संग्रह रचकर आधुनिकता और प्रगतिशीलता के इस दौर में भी उपेक्षित दलित-आदिवासी वर्ग की पीड़ा को पाठकों के समक्ष रखा है | आने वाले समय में कवि और अधिक पैनेपन के साथ अपने पाठकों से मुखातिब होगा, ऐसी अपेक्षा है |
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युद्ध अभी जारी है (कविता संग्रह)/अरविन्द भारती/वर्ष-2017/पृष्ठ-96/मूल्य-100 रुपये/बोधि प्रकाशन, जयपुर
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-बी.एल.पारस
गंगानगर (राज.)
बी. एल. 'पारस'
एक नवोदित रचनाकार,मंच संचालक,कॅरियर विशेषज्ञ के साथ ही राज.शिक्षा विभाग में अंग्रेजी व्याख्याता के पद पर कार्यरत !
Friday, 27 October 2017
व्यवस्था के खोखलेपन को उजागर करता संग्रह
Friday, 18 November 2016
शोषितों का सामूहिक बयान है 'म्हारै पांती रा सुपनां'
कनाडा के सुप्रसिद्ध कवि लियोनॉर्ड कॉहेन लिखते हैं-"कविता जिन्दगी का प्रमाण है | यदि आपकी जिन्दगी ठीक से जल रही है, तो बची हुई राख ही कविता है |" शायद यही कारण है कि किसी कवि द्वारा भोगे हुए अनुभवों को जब शब्दों की माला में पिरोया जाता हैं, तो पैदा हुई कविता हर पाठक को अपनी सी लगती है | वातानुकूलित कमरों में बैठकर कविताएं तो लिखी जा सकती हैं, लेकिन वे पाठक को अपने साथ जोड़कर उसकी पीड़ा को कम नही कर सकती | कविता की विषय वस्तु क्या हो-काल्पनिक, सुनी-सुनाई अथवा स्वयं भोगी हुई | स्वाभाविक रूप से अंतिम प्रकार की विषयवस्तु ही किसी रचना को कालजयी बनाती है और वही रचना पाठकों के हृदय पटल पर चिरकाल तक अंकित रहती है |
अनेक स्वनाम धन्य राजस्थानी साहित्यकारों की समृद्ध काव्य परंपरा का एक नया सितारा है-राजु सारसर 'राज', जिनके प्रथम कविता संग्रह 'म्हारै पांती रा सुपनां' को पढते हुए ये उम्मीद प्रगाढ़ होती है कि नई पीढी के कवियों में भी सराहनीय परिपक्वता है | राजु सारसर 'राज' की रचनाओं की प्रासंगिकता इस वजह से भी बढ जाती है कि वे किसी काल्पनिक प्रेम अथवा स्वयं के सुखद भविष्य के सपनों पर कलम चलाने की बजाय रोटी के लिए जूझते लोगों की पीड़ा को अपनी कविताओं में ढालते हैं | संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए पाठक स्वत: यह महसूस करने लगता है कि ये राजु सारसर 'राज' की कविताएं न होकर समाज के शोषितों का सामूहिक बयान है | हिन्दी माध्यम में पढे-लिखे नव लिखारे राजस्थानी में लेखन के समय जिस भाषाई कच्चेपन से जूझते हैं, वो 'राज' की कविताओं से कोसो दूर लगता है | राजस्थानी परिवेश से गहराई से जुड़े होने का ही परिणाम है कि कवि शिल्प की कसौटी पर खरा उतरते हुए बड़ी सहज भाषा में अपनी बात को बड़ी कलात्मकता के साथ पाठकों के समक्ष रखने में सफल हुआ है | कविताओं में आंतरिक लय का निर्वाह और लोक से जुड़ी शब्दावली तो सराहनीय है ही, यमक और श्लेष जैसे अलंकारों का प्रयोग शिल्प सौन्दर्य को चार चाँद लगाता है |
सदियों से मौन रहकर शोषण सहन करते आये लोगों से नवसृजन का आह्वान करते हुए कवि 'हिवड़ै री हूक' कविता में लिखता है-"सुण/हिवड़ै रा पट खोल/कीं न कीं तो बोल/सुण इण अंधारै रो/ओ लांबौ मून/इणनै अब तोड़ |"
कुटिल सामंती मनोवृत्ति के सेठ-साहुकारों के अत्याचारों की विभीषिका का भी ज्यों कवि खुद प्रत्यक्षदर्शी रहा हो | कविता 'कदै तांई' की ये पंक्तियाँ बेहद मार्मिक हैं-"नैणां रा समंदर सूकग्या/काची काया होगी पाखाण/ईं उमर रा उडणा सुपनां/बापड़ै सुखियै नै कींकर भावै/आधो भूखो नींद मांय उरणावै/पसवाड़ो फेरै/होठ हालै/जाणै/बो तो नींद मांय रोटी खावै |"
शोषण की पीड़ा से गुजरते हुए आम आदमी के सुनहरे भविष्य के सपने भी कवि देखता है, लेकिन उनके पूरे न हो पाने के मलाल को फिर यूँ बयां करता है-"लोई झयाण होय'र/मरणासण/पड्या बाट न्हालै/छेहळी हेली री/म्हारै पांती रा सुपनां |"
इसी तरह भूख बापड़ी, कमजोरां नै मार, माजणो, घेर, मून, हार-जीत, फरक आदि इसी श्रृंखला की बेजोड़ कविताएं हैं |
गृहस्थी का दूसरा पहिया कहलाने वाली नारी के प्रति दोगले व्यवहार और आये दिन होने वाले शोषण से आहत कवि 'डूंगी डीक' कविता में लिखता है-"सूंई छाती झेलती/अंतस रो दरद/नीसरै बीनण्यां/जकी है किणी रै घर री/बै'न बेटी/म्हूं देखणो पण नीं चावूं/देखूं पण रोजीनां |"
धरम अर धरती, कळजुग, कांई, वरदान आदि कविताएं समाज में व्याप्त अंधविश्वासों के साथ-साथ-साथ धर्मान्धता पर भी गहरी चोट करती हैं | 'आस्था' कविता की ये पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं-"मिंदरा-मसीतां-गिरजां मांय/माथौ निवावणै स्यूं ईं फगत/कोई नीं बण जावै आसतिक/हो जावै पण मिनख/संकड़ै दायरै में कैद |"
आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ ने गांवों के वातावरण को किस प्रकार नकारात्मक ढंग से प्रभावित किया है, इसकी बानगी हमें आदमी, गाँव, विकास, गरब, अंदेसो, लखण, डर आदि कविताओं में देखने को मिलती है | कविता सै'र की ये पंक्तियाँ शहरीकरण के खोखलेपन को उजागर करती हैं-"सड़का लीलगी/माटी री सौरम/घर बणग्या/कैदखानां मिनखां सारू/हेत रा तारां नैं/निगळग्यो/बेतारां रो अंतरजाळ |"
गाँव से लेकर वैश्विक स्तर पर हथियारों की अंधी दौड़ के प्रति चिंता जताते हुए देश में पसरी प्रशासनिक भ्रष्टता और राजनीतिक अशिष्टाचार भी कुछ कविताओं की विषय वस्तु बनती हैं | संग्रह की अंतिम कविता आम आदमी में कवि लिखता है-"बनराय में/बांस रा रुंखा रै/आपसरी में रगड़का खाय'र/लाग्योड़ै बड़वानळ में/ज्यूं बळ जावै/बापड़ी निबळी दूब/बिंया रा बिंया ईं बळै/आम आदमी रा सुपनां/सत्ता रै रगड़का सूं |"
कविता संग्रह को पढना शुरु कर ज्यों-ज्यों पाठक अंत की तरफ पहुँचता है, त्यों-त्यों कवि का कद बढता हुआ महसूस होता है | नि:संदेह इस कविता संग्रह ने न केवल राजस्थानी काव्य को समृद्ध किया है, बल्कि ये विश्वास भी पैदा किया है कि राजस्थानी साहित्य नये रचनाकारों के हाथों में नई ऊँचाईयों को छू लेगा |
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म्हारै पांती रा सुपनां (राजस्थानी कविता संग्रह)/राजु सारसर 'राज'/पृष्ठ 112/मूल्य 100 रुपये/बोधि प्रकाशन,जयपुर
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-बी.एल.'पारस'
श्रीगंगानगर (राज.)
Sunday, 16 October 2016
समाज सुधार की पहेली
एक बार एक चित्रकार ने शानदार चित्र बनाया | फिर ये सोचकर कि इसे और बेहत्तर बनाऊँ, उसने लोगों कि प्रतिक्रियायें जानने का फैसला किया | बीच बाजार में एक चौराहे पर चित्र लगाकर उसने लिखा कि इस चित्र में कोई एक कमी बताये | जो भी राहगीर उस सड़क से
गुजरता, कुछ देर उत्सुकतावश चित्र को देखता और नीचे एक कमी लिख देता | शाम को जब चित्रकार लौटा, तो उसने देखा कि उस शानदार चित्र के बारें में सैंकड़ो कमियां लिखी हुई हैं | चित्रकार की उत्सुकता और बढ गई | उसने अगली शाम वही चित्र उसी चौराहे पर लगाया और लिखा कि इस चित्र को और सुंदर बनाने हेतु एक उपाय सुझाये | सड़क से गुजरने वाले राहगीर उस चित्र को देखते और अच्छा बताते हुए आगे निकल जाते | शाम को जब चित्रकार लौटा, तो उसे आश्चर्य हुआ कि चित्र को अच्छा बनाने हेतु एक भी उपाय
नही लिखा हुआ है |
ठीक यही स्थिति हमारे समाज की है | यदि पूरे समाज को एक चित्र और नागरिकों को राहगीर मान लिया जाये, तो स्थति पूर्णतया स्पष्ट हो
जायेगी | समाज में कुरीतियां हैं, समाज अशिक्षित है, समाज नशे का शिकार है, समाज धार्मिक अंधविश्वासों और कर्मकाण्डों से प्रताड़ित है, समाज के लोग जागरूक नही हैं, जैसी ढेरों समस्याओं का जिक्र प्रत्येक व्यक्ति अपने वक्तव्य में करता है, लेकिन इन तमाम समस्याओं का समाधान कोई बताने में सक्षम नही और यदि कोई बता भी दे, तो उसे स्वीकार कर एकमत हो क्रियान्वित करने का सामर्थ्य हम में नही है | यद्यपि गाँव की चौपाल से लेकर महानगरों तक समाज के नाम पर ठेकेदारी करने वाले तथाकथित 'जोड़ू-बटोड़ू' नेताओं की कोई कमी नही हैं, लेकिन बाबा साहब प्रदत्त संवैधानिक अधिकारों के बावजूद भी समाज सुधार एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है | नेपोलियन ने कहा था-"यदि सौ कुत्तों की फौज का नेतृत्व एक शेर और सौ शेरों की फौज का नेतृत्व एक कुत्ता करें, तो कुत्तों की फौज जीत जायेगी |" क्या हमारे समाज में ऐसा कोई
शेर है, जो समाज के माथे पर लगे पिछड़ेपन के
कलंक को मिटाकर सामाजिक उत्थान की इस
लड़ाई को अंजाम तक पहुँचा सके ? वर्तमान
हालातों को देखते हुए मुझे नही लगता कि इसका उत्तर सकारात्मक है | हाँ, कुछ लोग शाम को अंग्रेजी या देसी शराब के चार पैग लगाकर जरूर शेर बन जाते होंगें और देर रात तक अपने बीवी-बच्चों अथवा पड़ौसी पर गुर्राते होंगें | फिर जब सुबह कोई उधार के पैसे माँगने आता होगा,
तो रजाई में मुँह छिपाकर सोने का बहाना करते
हुए ये भीगी बिल्ली बन जाते होंगे | विश्व के
सर्वश्रेष्ठ धम्मग्रंथ 'बुध्द और उनका धम्म' में
परम पूज्य बाबा साहब लिखते हैं-"पहले अपने
आप को ठीक मार्ग पर लगायें, तब दूसरों
को उपदेश दें |"
समाज के पिछड़े लोगों के उत्थान की जिम्मेदारी का निर्वहन समाज के जिस बुद्धिजीवी वर्ग को 'पे बैक टू सोसायटी' सिद्धांत के अनुसार करना
चाहिए था, वो ठीक ढंग से नही कर पाया और न वर्तमान में कर पा रहा है | एक बार यूनान के सुप्रसिद्ध शासक मीनाण्डर ने संपूर्ण विश्व के विद्वानों को अपने प्रश्नों के जवाब देने की चुनौती दी | बौद्ध भिक्खु भंते नागसेन ने मीनाण्डर के सभी प्रश्नों के संतोषजनक जवाब दिये | मीनाण्डर का एक प्रश्न हमारे समाज के संदर्भ में बेहद प्रासंगिक है | उसने पूछा-"भंते ! कोई धम्म लुप्त क्यों हो जाता है ?" भंते नागसेन ने जवाब दिया-"हे राजन ! किसी धम्म के लुप्त हो जाने के तीन कारण हैं-पहला, जब धम्म के
सिद्धांत और शिक्षायें जनता की पहुँच
से दूर हो जाये | दूसरा, जब धम्म के सिद्धांत और शिक्षाओं को जनता की आवाज में जनता
तक पहुँचाने वाले लोग नही हो | तीसरा, जब धम्म के सिद्धांत और शिक्षाओं को आचरण में न उतारा जाये |" हमारे समाज के साथ भी ठीक
यही हुआ है | हमारा गौरवशाली अतीत और
परंपरायें हमसे दूर हुई, समाज पिछड़ता गया |
हमारे गौरवशाली अतीत और परंपराओं को हमारी भाषा में हम तक पहुँचाने वाला कोई
बुद्धिजीवी नही आया, समाज पिछड़ता गया |
हमारे गौरवशाली अतीत और परंपराओं को हमने अपने आचरण में नही उतारा, समाज पिछड़ता गया | आज न तो हम अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित है और न अपनी
प्राचीन परंपराओं से | ऐसे हालातों में समाज सुधार का राग एक भद्दा मजाक बनकर रह
गया है |
'अपने आदर्शों को आचरण में उतारें' पुस्तक में धम्मभूमि आंदोलन के संयोजक और भारत के क्रांतिकारी भिक्खु श्रद्धेय भंते डॉ.करूणाशील 'राहुल' लिखते हैं-"यदि अँधेरे को खत्म करना है, तो अँधेरा-अँधेरा चिल्लाने से अँधेरा खत्म नही होगा, मंत्रों का जाप करने से अँधेरा खत्म नही होगा, लंबे-लंबे भाषणों से अँधेरा खत्म नही
होगा, बल्कि हमें प्रकाश की व्यवस्था करनी होगी |"
क्या हम समाज में पसरे बुराईयों-कुरीतियों रूपी
अँधेरे को दूर करने हेतु रचनात्मक काम रूपी प्रकाश की व्यवस्था कर पाये ? यदि छूछक,भात, दहेज, मृत्युभोज जैसी सामाजिक कुरीतियां समाज को गरीब और गुलाम बनाये हुए थी, तो क्या हमें घर-घर जाकर इनके
प्रति जागृति पैदा कर इनका परित्याग कर अन्य
वैकल्पिक व्यवस्था को आत्मसात नही
कर लेना चाहिए था ? यदि समाज नशे से
पीड़ित था, तो क्या हमें गाँव-गाँव में नशा
मुक्ति और नशा जन जागृति शिविरों का आयोजन नही करना चाहिए था ? क्या समाज
के चिकित्सक वर्ग को इस क्षेत्र में अपनी सेवायें समाज हित में उपलब्ध नही करवानी चाहिए
थी ? यदि समाज अशिक्षा का शिकार है,
तो क्या हमें राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले की तरह स्वयं की शिक्षा व्यवस्था का निर्माण नही कर लेना चाहिए था ? क्या हमें पढे-लिखें बच्चों हेतु करियर काउंसलिंग की व्यवस्था नही
करनी चाहिए थी ? क्या हमें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे निर्धन प्रतियोगियों की सहायता हेतु नि:शुल्क कॉचिंग सेंटर प्रत्येक जिला मुख्यालय पर आरंभ नही कर देने चाहिए थे ? क्या हमें शहरों में रह रहे विद्यार्थियों हेतु
छात्रावासों की स्थापना नही कर देनी चाहिए थी ? यदि गरीबी हर घर की स्थाई मेहमान बनी
हुई थी, तो क्या हमें लोगों को व्यवसाय प्रशिक्षण नही देना चाहिए था, ताकि वे दिहाड़ी-मजदूरी
छोड़कर स्व व्यवसाय कर सकें ? क्या हमें अपने समाज बांधवों को लघु उद्योगों की स्थापना हेतु नैतिक और आर्थिक समर्थन
नही देना चाहिए था ? यदि वर्तमान धर्म हमें पंगु बनाकर हमारे स्वाभिमान को ठेस पहुँचा रहा था, तो क्या हमें बाबा साहब का दिखाया समतामूलक और स्वाभिमानी बुद्ध का धम्म अात्मसात् नही कर लेना चाहिए था ? यदि इन प्रश्नों का जवाब हाँ है, तो नि:संदेह आप समाज सुधार की अबूझ पहेली की गाँठें खोलने में
सफल हो सकते हैं |
खुद को समाज का सबसे बड़ा नेता दिखाने
की चाह में हम ये भूल जाते हैं कि हम समाज के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं | जब तक आपसी विचार-विमर्श द्वारा एक सार्थक योजना का निर्माण कर उसकी बेहत्तर ढंग से क्रियान्विति नही की जाती, तब तक समाज सुधार के ख्वाब देखना और दिखाना समाज को गुमराह करने से ज्यादा कुछ नही है | राजेंद्र बौद्ध अपने निबंध 'लक्ष्य प्राप्ति में असफल होते संगठन' में लिखते हैं-"यदि जीवन में लक्ष्य के
अँगूर न मिले, तो ये मत कहें कि अँगूर खट्टे थे,
बल्कि इस सच्चाई को स्वीकार करें कि मेरी छलांग छोटी थी और अगली बार अपनी छलांग को बड़ा करे | यदि लक्ष्य तक हाथ न पहुँचे, तो हाथ को और आगे बढाये, यदि आँखें लक्ष्य को न देख पा रही हो, तो आँखों को और खोले, यदि कान लक्ष्य की आहट न सुन पा रहे हो, तो
कानों को और ज्यादा सुनने का प्रशिक्षण दें |"
व्यक्तिगत स्तर पर किये गये छोटे-छोटे प्रयासों
की अपेक्षा सामूहिक प्रयासों के परिणाम
और प्रभाव व्यापक व स्थाई होते हैं | भारत के 15 राज्यों के लगभग 150 जिलों में सफलतापूर्वक संचालित धम्मभूमि आंदोलन इसका अनुकरणीय उदाहरण है | अत:
समाज सुधार के कॉपी-पेस्ट मापदण्डों से
बाहर निकल कर सकारात्मक और विस्तृत दृष्टिकोण का सृजन कर स्वयं को किसी राष्ट्रव्यापी संगठन की हिस्सा बनायें, समाज की दशा और दिशा दोनों बदल जायेगी |
-बी.एल.'पारस'
धम्मभूमि राजस्थान
Saturday, 15 October 2016
मर गया क्या आदमी ?
बीच सड़क टकराई एक बाईक
गलत दिशा से आती जीप से
पसर गये कुछ जिस्म
सड़क की काली छाती पर
छोड़ते हुए लाल निशान,
पल भर को रुके कुछ राहगीर
चल दिये फिर मुँह फेर कर,
किसी ने पूछा-
मर गया क्या आदमी ?
मेरे अंदर से आवाज आई-
जिंदा है वो आदमी
जो धड़क रहा है बीच सड़क,
मर तो हम सब गये हैं
जो कर रहे हैं अनदेखा उसे |
ग़ज़ल
बोलते जो बोलने दे,
आग में भी झोंकने दे |
भींचकर जो होठ बैठे,
सच सुना,फिर चौंकने दे |
ये कुत्ते काट नही सकते,
भौंकतें हैं, भौंकने दे |
झोंपड़ी को ले उड़ेगी,
आँधियों को रोकने दे |
तान के सर झूठ खड़ा
रुक ! मुझको टोकने दे |
प्यार करता हूँ कि नही,
रात भर तो सोचने दे |
Friday, 14 October 2016
अपना आदर्श तय करो/राजेन्द्र बौद्ध
कोई भी समुदाय या वर्ग जब एकता की बात करता है,एक जाजम पर बैठने की बात करता है,तो उसे सबसे पहले सामाजिक एवं धार्मिक एकता की आवश्यकता पड़ती है |
यदि कोई समाज सामाजिक एवं धार्मिक एकरुपता की भावना को नजरअंदाज करता है,तो वह छिन्न भिन्न हो जाता है | ऐसे में विभिन्न मत-मतान्तरो के लोग कोई निर्धारित बड़ा लक्षय प्राप्त नही कर पाते और अलग -अलग गुटों में कभी न खत्म होने वाला संघर्ष करते रहते हैं | कालांतर मे यही गुट पृथक्क पृथक्क समूहों, जातियों अथवा वर्गो मे बंटकर घाघ राजनेताओ, चालबाजो व स्वार्थी लोगो के हाथों की कठपुतली बन जाते है | ये गुट इस बात से अनभिज्ञ रहते है कि इस प्रकार की नादानी से स्वंय के समाज का कितना बड़ा नुकसान कर रहे है ? यदि ये विभिन्न गुट अपनी संकीर्णता छोड़ दूरदर्शिता से मनन करे ,तो समाज विकास व सम्मान के असंख्य मार्ग स्वत: ही खुल जायेंगें |
सिक्ख समुदाय का ज्यादा पुराना इतिहास नही है, किंतु गुरु गोविंद सिह ने राजनैतिक शक्ति से पहले सामाजिक व धार्मिक रुप से अपने समस्त अनुयायियों को एक ही जाजम पर एकत्रित कर उनकी आस्था व विश्वास को स्थिर किया और सबको एक ही आदेश मानने का उपदेश दिया | हम आज भी देख सकते है कि श्री अकाल तख्त साहिब,अमृतसर से समस्त सिक्ख समुदाय संचालित होता है | मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक अकाल तख्त मे हाजिरी देते है तथा गलती पर क्षमा याचना भी करते है | ठीक इसी तरह से पूरी दुनिया की ईसाईयत वेटिकन सिटी के पोप से संचालित होती है |
प्रत्येक ईसाई पोप के प्रति आस्थावान है और उसके आदेश की अनुपालना करता है |
अब यदि हम अपने समाज की बात करें,तो ये कड़वी सच्चाई है की हम कभी एक जाजम पर नही बैठ पाए | जाजम तो दूर, यदि घर मे एक चारपाई पर भी बैठ जाऐ,तो बिना वाद के खड़े नही होंगे | हम सबके सामाजिक रिवाज भिन्न है,धार्मिक मत भिन्न है | बड़े आश्चर्य की बात है कि एक ही जाति समुदाय के होने के बावजुद भी व्यावाहिरक भिन्नता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है | हमारी यही भिन्नता हमारे समग्र विकास मे मुख्य अवरोधक बनी हूई है | किसी की आस्था लाधुनाथ जी में, तो किसी की पाबूजी मे, कोई पल्लू की तीर्थ यात्रा पर जाता है, तो किसी को तौलियासर जाकर संतुष्टि मिलती है | कोई रामदेवजी के परचो मे विश्वास रखता है, तो कोई धन-धन सतगुरु के दरबार में | कोई खुद को कबीरपंथी कहने मे गर्व महसूस करता है, तो कोई पितृ पूजा में | पूरी दुनिया मे ऐसी विसंगति का उदाहरण और कही नही मिलेगा, जहां एक ही समुदाय के लोग इतने मतों मे विभाजित हो |
हमारे समाज की उत्पति को लेकर भांति-भांति के मत है, किंतु ये सार्वभौंमिक सत्य है की जन्म से निश्चित हिंदू सामाजिक व्यवस्था के चार वर्णो -ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,और शूद्र में से हम जन्मजात शूद्र हैं | कोई भी व्यक्ति लाख प्रयासो के बावजूद भी अपनी जाति अथवा वर्ण को बदल नही सकता | इसी जाति व्यवस्था के कारण आज भी लोग हमे हेय दृष्टि से देखते हैं |
हम अपने आप को कितना भी उच्च कहे, परंतु हमारे मानने या नही मानने से सच्चाई छिप नही सकती | अन्य लोग भले ही हमारी उपस्थिति मे हमारी इज्जत करतें हो, मगर पीठ पीछे सजातिय लोगो के साथ हमारे लिये अपमानजनक संबोधनो से बाज नही आते | ऐसे लोगो के षड़यंत्र की वजह से ही हमारी सामाजिक एकता निरंतर खंडित हो रही है |
अब समय आ गया है कि हम सामाजिक और धार्मिक एकरुपता ग्रहण करते हुए, एक ही जाजम पर बैठते हूऐ दूरदर्शिता का परिचय देते हुए समाजोत्थान हेतु वांछित प्रयास करे | हमें स्वयं की सामाजिक तथा धार्मिक स्थिति का सही ज्ञान करने की आवश्यकता है | हमें आज यह जानने की आवश्यकता है कि हमे जिस जाति प्रमाण पत्र का उपयोग शिक्षा,राजकीय सेवा,स्वास्थ्य सेवा और राजनीति जैसे क्षेत्रों में कर रहे है, वो हमारी जाति की वजह से नही बल्कि हमारे दलित-पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व के रुप मे मिला है | इस प्रतिनिधित्व का अधिकार हमे डॉ.आंबेडकर के साईमन कमीशन(1921), गोलमेज सम्मेलन(1929-31)और पूना पैक्ट(1932) में कठोर विद्वतापूर्ण संघर्ष के प्रतिफल के रुप मे मिला है |
हमारे सामने कुछ जातियो के प्रत्यक्ष उदाहरण भी है, जिन्होने डॉ.आंबेडकर के प्रति आस्था रखते हुए उनको आदर्श स्वीकार किया, वे जातियां आज विकास की दौड़ मे सबसे आगे है | आज शासन प्रशासन,शिक्षा,व्यवसाय में इन्ही जातियो की भागीदारी अधिक है | हमारी व्यक्तिगत मान्यतायें चाहे कुछ भी हो, उन्हें दूसरो पर थोपने की बजाय विवेकशील बनकर एक विश्वव्यापी दृष्टिकोण अपनाते हूए,तर्कसम्मत सामाजिक,धार्मिक,शैक्षिक,आर्थिक,राजनीतिक हितैषी विचारो को नि:संकोच अपनाना चाहिऐ |
यदि आपको ये लगता है कि डॉ.आंबेडकर की विचारधारा और बुद्ध के धम्म से भी श्रेष्ठ अन्य मार्ग है, तो उसका निष्पक्ष तुलनात्मक अध्ययन कर पूरे समाज को एक जाजम पर लाकर उपयोगिता समझानी चाहिऐ | जो कुछ समाज हित में हो, उसे बिना समय व्यर्थ किये स्वीकार कर लेना चाहिऐ और फिर उसी के अनुरुप सारे समाज का सामाजिक और धार्मिक ढांचा संचालित होना चाहिऐ |
तुलनात्मक अध्यन और सामूहिक निर्णय केे आधार पर एक बार निश्चित किये जाने के बाद सारे समुदाय को विचारधारा का अनुसरण करणा चाहिऐ | यही मजबूत आदर्श समाज का सर्वांगीण विकास करने मे सक्षम होगा, अन्यथा अपनी-अपनी राग की राह पर चलते हूए लकीर का फकीर बने रहने से समाज सुधार रुपी मंजिल से हमारी दूरी यूँ ही बनी रहेगी |