एक बार एक चित्रकार ने शानदार चित्र बनाया | फिर ये सोचकर कि इसे और बेहत्तर बनाऊँ, उसने लोगों कि प्रतिक्रियायें जानने का फैसला किया | बीच बाजार में एक चौराहे पर चित्र लगाकर उसने लिखा कि इस चित्र में कोई एक कमी बताये | जो भी राहगीर उस सड़क से
गुजरता, कुछ देर उत्सुकतावश चित्र को देखता और नीचे एक कमी लिख देता | शाम को जब चित्रकार लौटा, तो उसने देखा कि उस शानदार चित्र के बारें में सैंकड़ो कमियां लिखी हुई हैं | चित्रकार की उत्सुकता और बढ गई | उसने अगली शाम वही चित्र उसी चौराहे पर लगाया और लिखा कि इस चित्र को और सुंदर बनाने हेतु एक उपाय सुझाये | सड़क से गुजरने वाले राहगीर उस चित्र को देखते और अच्छा बताते हुए आगे निकल जाते | शाम को जब चित्रकार लौटा, तो उसे आश्चर्य हुआ कि चित्र को अच्छा बनाने हेतु एक भी उपाय
नही लिखा हुआ है |
ठीक यही स्थिति हमारे समाज की है | यदि पूरे समाज को एक चित्र और नागरिकों को राहगीर मान लिया जाये, तो स्थति पूर्णतया स्पष्ट हो
जायेगी | समाज में कुरीतियां हैं, समाज अशिक्षित है, समाज नशे का शिकार है, समाज धार्मिक अंधविश्वासों और कर्मकाण्डों से प्रताड़ित है, समाज के लोग जागरूक नही हैं, जैसी ढेरों समस्याओं का जिक्र प्रत्येक व्यक्ति अपने वक्तव्य में करता है, लेकिन इन तमाम समस्याओं का समाधान कोई बताने में सक्षम नही और यदि कोई बता भी दे, तो उसे स्वीकार कर एकमत हो क्रियान्वित करने का सामर्थ्य हम में नही है | यद्यपि गाँव की चौपाल से लेकर महानगरों तक समाज के नाम पर ठेकेदारी करने वाले तथाकथित 'जोड़ू-बटोड़ू' नेताओं की कोई कमी नही हैं, लेकिन बाबा साहब प्रदत्त संवैधानिक अधिकारों के बावजूद भी समाज सुधार एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है | नेपोलियन ने कहा था-"यदि सौ कुत्तों की फौज का नेतृत्व एक शेर और सौ शेरों की फौज का नेतृत्व एक कुत्ता करें, तो कुत्तों की फौज जीत जायेगी |" क्या हमारे समाज में ऐसा कोई
शेर है, जो समाज के माथे पर लगे पिछड़ेपन के
कलंक को मिटाकर सामाजिक उत्थान की इस
लड़ाई को अंजाम तक पहुँचा सके ? वर्तमान
हालातों को देखते हुए मुझे नही लगता कि इसका उत्तर सकारात्मक है | हाँ, कुछ लोग शाम को अंग्रेजी या देसी शराब के चार पैग लगाकर जरूर शेर बन जाते होंगें और देर रात तक अपने बीवी-बच्चों अथवा पड़ौसी पर गुर्राते होंगें | फिर जब सुबह कोई उधार के पैसे माँगने आता होगा,
तो रजाई में मुँह छिपाकर सोने का बहाना करते
हुए ये भीगी बिल्ली बन जाते होंगे | विश्व के
सर्वश्रेष्ठ धम्मग्रंथ 'बुध्द और उनका धम्म' में
परम पूज्य बाबा साहब लिखते हैं-"पहले अपने
आप को ठीक मार्ग पर लगायें, तब दूसरों
को उपदेश दें |"
समाज के पिछड़े लोगों के उत्थान की जिम्मेदारी का निर्वहन समाज के जिस बुद्धिजीवी वर्ग को 'पे बैक टू सोसायटी' सिद्धांत के अनुसार करना
चाहिए था, वो ठीक ढंग से नही कर पाया और न वर्तमान में कर पा रहा है | एक बार यूनान के सुप्रसिद्ध शासक मीनाण्डर ने संपूर्ण विश्व के विद्वानों को अपने प्रश्नों के जवाब देने की चुनौती दी | बौद्ध भिक्खु भंते नागसेन ने मीनाण्डर के सभी प्रश्नों के संतोषजनक जवाब दिये | मीनाण्डर का एक प्रश्न हमारे समाज के संदर्भ में बेहद प्रासंगिक है | उसने पूछा-"भंते ! कोई धम्म लुप्त क्यों हो जाता है ?" भंते नागसेन ने जवाब दिया-"हे राजन ! किसी धम्म के लुप्त हो जाने के तीन कारण हैं-पहला, जब धम्म के
सिद्धांत और शिक्षायें जनता की पहुँच
से दूर हो जाये | दूसरा, जब धम्म के सिद्धांत और शिक्षाओं को जनता की आवाज में जनता
तक पहुँचाने वाले लोग नही हो | तीसरा, जब धम्म के सिद्धांत और शिक्षाओं को आचरण में न उतारा जाये |" हमारे समाज के साथ भी ठीक
यही हुआ है | हमारा गौरवशाली अतीत और
परंपरायें हमसे दूर हुई, समाज पिछड़ता गया |
हमारे गौरवशाली अतीत और परंपराओं को हमारी भाषा में हम तक पहुँचाने वाला कोई
बुद्धिजीवी नही आया, समाज पिछड़ता गया |
हमारे गौरवशाली अतीत और परंपराओं को हमने अपने आचरण में नही उतारा, समाज पिछड़ता गया | आज न तो हम अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित है और न अपनी
प्राचीन परंपराओं से | ऐसे हालातों में समाज सुधार का राग एक भद्दा मजाक बनकर रह
गया है |
'अपने आदर्शों को आचरण में उतारें' पुस्तक में धम्मभूमि आंदोलन के संयोजक और भारत के क्रांतिकारी भिक्खु श्रद्धेय भंते डॉ.करूणाशील 'राहुल' लिखते हैं-"यदि अँधेरे को खत्म करना है, तो अँधेरा-अँधेरा चिल्लाने से अँधेरा खत्म नही होगा, मंत्रों का जाप करने से अँधेरा खत्म नही होगा, लंबे-लंबे भाषणों से अँधेरा खत्म नही
होगा, बल्कि हमें प्रकाश की व्यवस्था करनी होगी |"
क्या हम समाज में पसरे बुराईयों-कुरीतियों रूपी
अँधेरे को दूर करने हेतु रचनात्मक काम रूपी प्रकाश की व्यवस्था कर पाये ? यदि छूछक,भात, दहेज, मृत्युभोज जैसी सामाजिक कुरीतियां समाज को गरीब और गुलाम बनाये हुए थी, तो क्या हमें घर-घर जाकर इनके
प्रति जागृति पैदा कर इनका परित्याग कर अन्य
वैकल्पिक व्यवस्था को आत्मसात नही
कर लेना चाहिए था ? यदि समाज नशे से
पीड़ित था, तो क्या हमें गाँव-गाँव में नशा
मुक्ति और नशा जन जागृति शिविरों का आयोजन नही करना चाहिए था ? क्या समाज
के चिकित्सक वर्ग को इस क्षेत्र में अपनी सेवायें समाज हित में उपलब्ध नही करवानी चाहिए
थी ? यदि समाज अशिक्षा का शिकार है,
तो क्या हमें राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले की तरह स्वयं की शिक्षा व्यवस्था का निर्माण नही कर लेना चाहिए था ? क्या हमें पढे-लिखें बच्चों हेतु करियर काउंसलिंग की व्यवस्था नही
करनी चाहिए थी ? क्या हमें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे निर्धन प्रतियोगियों की सहायता हेतु नि:शुल्क कॉचिंग सेंटर प्रत्येक जिला मुख्यालय पर आरंभ नही कर देने चाहिए थे ? क्या हमें शहरों में रह रहे विद्यार्थियों हेतु
छात्रावासों की स्थापना नही कर देनी चाहिए थी ? यदि गरीबी हर घर की स्थाई मेहमान बनी
हुई थी, तो क्या हमें लोगों को व्यवसाय प्रशिक्षण नही देना चाहिए था, ताकि वे दिहाड़ी-मजदूरी
छोड़कर स्व व्यवसाय कर सकें ? क्या हमें अपने समाज बांधवों को लघु उद्योगों की स्थापना हेतु नैतिक और आर्थिक समर्थन
नही देना चाहिए था ? यदि वर्तमान धर्म हमें पंगु बनाकर हमारे स्वाभिमान को ठेस पहुँचा रहा था, तो क्या हमें बाबा साहब का दिखाया समतामूलक और स्वाभिमानी बुद्ध का धम्म अात्मसात् नही कर लेना चाहिए था ? यदि इन प्रश्नों का जवाब हाँ है, तो नि:संदेह आप समाज सुधार की अबूझ पहेली की गाँठें खोलने में
सफल हो सकते हैं |
खुद को समाज का सबसे बड़ा नेता दिखाने
की चाह में हम ये भूल जाते हैं कि हम समाज के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं | जब तक आपसी विचार-विमर्श द्वारा एक सार्थक योजना का निर्माण कर उसकी बेहत्तर ढंग से क्रियान्विति नही की जाती, तब तक समाज सुधार के ख्वाब देखना और दिखाना समाज को गुमराह करने से ज्यादा कुछ नही है | राजेंद्र बौद्ध अपने निबंध 'लक्ष्य प्राप्ति में असफल होते संगठन' में लिखते हैं-"यदि जीवन में लक्ष्य के
अँगूर न मिले, तो ये मत कहें कि अँगूर खट्टे थे,
बल्कि इस सच्चाई को स्वीकार करें कि मेरी छलांग छोटी थी और अगली बार अपनी छलांग को बड़ा करे | यदि लक्ष्य तक हाथ न पहुँचे, तो हाथ को और आगे बढाये, यदि आँखें लक्ष्य को न देख पा रही हो, तो आँखों को और खोले, यदि कान लक्ष्य की आहट न सुन पा रहे हो, तो
कानों को और ज्यादा सुनने का प्रशिक्षण दें |"
व्यक्तिगत स्तर पर किये गये छोटे-छोटे प्रयासों
की अपेक्षा सामूहिक प्रयासों के परिणाम
और प्रभाव व्यापक व स्थाई होते हैं | भारत के 15 राज्यों के लगभग 150 जिलों में सफलतापूर्वक संचालित धम्मभूमि आंदोलन इसका अनुकरणीय उदाहरण है | अत:
समाज सुधार के कॉपी-पेस्ट मापदण्डों से
बाहर निकल कर सकारात्मक और विस्तृत दृष्टिकोण का सृजन कर स्वयं को किसी राष्ट्रव्यापी संगठन की हिस्सा बनायें, समाज की दशा और दिशा दोनों बदल जायेगी |
-बी.एल.'पारस'
धम्मभूमि राजस्थान
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