कोई भी समुदाय या वर्ग जब एकता की बात करता है,एक जाजम पर बैठने की बात करता है,तो उसे सबसे पहले सामाजिक एवं धार्मिक एकता की आवश्यकता पड़ती है |
यदि कोई समाज सामाजिक एवं धार्मिक एकरुपता की भावना को नजरअंदाज करता है,तो वह छिन्न भिन्न हो जाता है | ऐसे में विभिन्न मत-मतान्तरो के लोग कोई निर्धारित बड़ा लक्षय प्राप्त नही कर पाते और अलग -अलग गुटों में कभी न खत्म होने वाला संघर्ष करते रहते हैं | कालांतर मे यही गुट पृथक्क पृथक्क समूहों, जातियों अथवा वर्गो मे बंटकर घाघ राजनेताओ, चालबाजो व स्वार्थी लोगो के हाथों की कठपुतली बन जाते है | ये गुट इस बात से अनभिज्ञ रहते है कि इस प्रकार की नादानी से स्वंय के समाज का कितना बड़ा नुकसान कर रहे है ? यदि ये विभिन्न गुट अपनी संकीर्णता छोड़ दूरदर्शिता से मनन करे ,तो समाज विकास व सम्मान के असंख्य मार्ग स्वत: ही खुल जायेंगें |
सिक्ख समुदाय का ज्यादा पुराना इतिहास नही है, किंतु गुरु गोविंद सिह ने राजनैतिक शक्ति से पहले सामाजिक व धार्मिक रुप से अपने समस्त अनुयायियों को एक ही जाजम पर एकत्रित कर उनकी आस्था व विश्वास को स्थिर किया और सबको एक ही आदेश मानने का उपदेश दिया | हम आज भी देख सकते है कि श्री अकाल तख्त साहिब,अमृतसर से समस्त सिक्ख समुदाय संचालित होता है | मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक अकाल तख्त मे हाजिरी देते है तथा गलती पर क्षमा याचना भी करते है | ठीक इसी तरह से पूरी दुनिया की ईसाईयत वेटिकन सिटी के पोप से संचालित होती है |
प्रत्येक ईसाई पोप के प्रति आस्थावान है और उसके आदेश की अनुपालना करता है |
अब यदि हम अपने समाज की बात करें,तो ये कड़वी सच्चाई है की हम कभी एक जाजम पर नही बैठ पाए | जाजम तो दूर, यदि घर मे एक चारपाई पर भी बैठ जाऐ,तो बिना वाद के खड़े नही होंगे | हम सबके सामाजिक रिवाज भिन्न है,धार्मिक मत भिन्न है | बड़े आश्चर्य की बात है कि एक ही जाति समुदाय के होने के बावजुद भी व्यावाहिरक भिन्नता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है | हमारी यही भिन्नता हमारे समग्र विकास मे मुख्य अवरोधक बनी हूई है | किसी की आस्था लाधुनाथ जी में, तो किसी की पाबूजी मे, कोई पल्लू की तीर्थ यात्रा पर जाता है, तो किसी को तौलियासर जाकर संतुष्टि मिलती है | कोई रामदेवजी के परचो मे विश्वास रखता है, तो कोई धन-धन सतगुरु के दरबार में | कोई खुद को कबीरपंथी कहने मे गर्व महसूस करता है, तो कोई पितृ पूजा में | पूरी दुनिया मे ऐसी विसंगति का उदाहरण और कही नही मिलेगा, जहां एक ही समुदाय के लोग इतने मतों मे विभाजित हो |
हमारे समाज की उत्पति को लेकर भांति-भांति के मत है, किंतु ये सार्वभौंमिक सत्य है की जन्म से निश्चित हिंदू सामाजिक व्यवस्था के चार वर्णो -ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,और शूद्र में से हम जन्मजात शूद्र हैं | कोई भी व्यक्ति लाख प्रयासो के बावजूद भी अपनी जाति अथवा वर्ण को बदल नही सकता | इसी जाति व्यवस्था के कारण आज भी लोग हमे हेय दृष्टि से देखते हैं |
हम अपने आप को कितना भी उच्च कहे, परंतु हमारे मानने या नही मानने से सच्चाई छिप नही सकती | अन्य लोग भले ही हमारी उपस्थिति मे हमारी इज्जत करतें हो, मगर पीठ पीछे सजातिय लोगो के साथ हमारे लिये अपमानजनक संबोधनो से बाज नही आते | ऐसे लोगो के षड़यंत्र की वजह से ही हमारी सामाजिक एकता निरंतर खंडित हो रही है |
अब समय आ गया है कि हम सामाजिक और धार्मिक एकरुपता ग्रहण करते हुए, एक ही जाजम पर बैठते हूऐ दूरदर्शिता का परिचय देते हुए समाजोत्थान हेतु वांछित प्रयास करे | हमें स्वयं की सामाजिक तथा धार्मिक स्थिति का सही ज्ञान करने की आवश्यकता है | हमें आज यह जानने की आवश्यकता है कि हमे जिस जाति प्रमाण पत्र का उपयोग शिक्षा,राजकीय सेवा,स्वास्थ्य सेवा और राजनीति जैसे क्षेत्रों में कर रहे है, वो हमारी जाति की वजह से नही बल्कि हमारे दलित-पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व के रुप मे मिला है | इस प्रतिनिधित्व का अधिकार हमे डॉ.आंबेडकर के साईमन कमीशन(1921), गोलमेज सम्मेलन(1929-31)और पूना पैक्ट(1932) में कठोर विद्वतापूर्ण संघर्ष के प्रतिफल के रुप मे मिला है |
हमारे सामने कुछ जातियो के प्रत्यक्ष उदाहरण भी है, जिन्होने डॉ.आंबेडकर के प्रति आस्था रखते हुए उनको आदर्श स्वीकार किया, वे जातियां आज विकास की दौड़ मे सबसे आगे है | आज शासन प्रशासन,शिक्षा,व्यवसाय में इन्ही जातियो की भागीदारी अधिक है | हमारी व्यक्तिगत मान्यतायें चाहे कुछ भी हो, उन्हें दूसरो पर थोपने की बजाय विवेकशील बनकर एक विश्वव्यापी दृष्टिकोण अपनाते हूए,तर्कसम्मत सामाजिक,धार्मिक,शैक्षिक,आर्थिक,राजनीतिक हितैषी विचारो को नि:संकोच अपनाना चाहिऐ |
यदि आपको ये लगता है कि डॉ.आंबेडकर की विचारधारा और बुद्ध के धम्म से भी श्रेष्ठ अन्य मार्ग है, तो उसका निष्पक्ष तुलनात्मक अध्ययन कर पूरे समाज को एक जाजम पर लाकर उपयोगिता समझानी चाहिऐ | जो कुछ समाज हित में हो, उसे बिना समय व्यर्थ किये स्वीकार कर लेना चाहिऐ और फिर उसी के अनुरुप सारे समाज का सामाजिक और धार्मिक ढांचा संचालित होना चाहिऐ |
तुलनात्मक अध्यन और सामूहिक निर्णय केे आधार पर एक बार निश्चित किये जाने के बाद सारे समुदाय को विचारधारा का अनुसरण करणा चाहिऐ | यही मजबूत आदर्श समाज का सर्वांगीण विकास करने मे सक्षम होगा, अन्यथा अपनी-अपनी राग की राह पर चलते हूए लकीर का फकीर बने रहने से समाज सुधार रुपी मंजिल से हमारी दूरी यूँ ही बनी रहेगी |
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