मानकर
इक अजनबी को
अपना,
कर दिया था
शुरु मैँनेँ
इक अनजाना सफर,
बेशक
तुमसे मुलाकात ही
नही थी
मंजिल मेरी ।
गम भला
मैँ क्योँ करुँ
तु मिला तो नही
पर अब
अजनबी भी तो नही रहा ।
एक नवोदित रचनाकार,मंच संचालक,कॅरियर विशेषज्ञ के साथ ही राज.शिक्षा विभाग में अंग्रेजी व्याख्याता के पद पर कार्यरत !
Wednesday, 17 April 2013
Wednesday, 10 April 2013
कलियुग की पराकाष्ठा
समस्त संवेदनायेँ
हो चुकी मृत,
खोखले हो चुके है
आदर्श,
ढीले पङ चुके है तार
संस्कारोँ के,
दम तोङ रही है प्रबल आस्थायेँ ।
कुंठित हो रहे है
भावुक इंसान,
घुट-घुटकर मर रहे है
दौलत के बोझ से देवता,
सङकोँ पर नंगे नाचते हैँ हत्यारेँ
बनाकर मौत को अपनी दुल्हन,
जिन्दा ही दफन कर दी गयी है
मानवीयता ।
ये कलियुग की पराकाष्ठा है
अथवा
हमारा नैतिक पतन ?
क्या अब भी कुछ होना बाकी है ?
हमारा जिन्दा लाशेँ बनना बाकी है ?
अगर हाँ
तो बैठ जाईये घुटने टिकाकर
देखते रहिये तमाशा
इस मार्मिक सर्कस का ।
और यदि ना है
तो हो जाईये खङे मेरे संग
विरोध मेँ,
ताकि जिन्दा रह सके,
इंसानियत
और बचायी जा सके
मासूमियत ।
हो चुकी मृत,
खोखले हो चुके है
आदर्श,
ढीले पङ चुके है तार
संस्कारोँ के,
दम तोङ रही है प्रबल आस्थायेँ ।
कुंठित हो रहे है
भावुक इंसान,
घुट-घुटकर मर रहे है
दौलत के बोझ से देवता,
सङकोँ पर नंगे नाचते हैँ हत्यारेँ
बनाकर मौत को अपनी दुल्हन,
जिन्दा ही दफन कर दी गयी है
मानवीयता ।
ये कलियुग की पराकाष्ठा है
अथवा
हमारा नैतिक पतन ?
क्या अब भी कुछ होना बाकी है ?
हमारा जिन्दा लाशेँ बनना बाकी है ?
अगर हाँ
तो बैठ जाईये घुटने टिकाकर
देखते रहिये तमाशा
इस मार्मिक सर्कस का ।
और यदि ना है
तो हो जाईये खङे मेरे संग
विरोध मेँ,
ताकि जिन्दा रह सके,
इंसानियत
और बचायी जा सके
मासूमियत ।
Tuesday, 9 April 2013
आदमी
(1)
भेङिये सा खूँखार
सियार सा चतुर
कौवे सा काला
साँप सा कृतघ्न
कितना बहुआयामी
बन गया है
आदमी ।
(2)
पढकर अखबार मेँ
मृतकोँ की संख्या
एक आदमी
कहता है-
जनसंख्या फिर भी बढ रही है ।
(3)
ना उसे कोई बुरा कहता है
ना किसी को वो बुरा कहता है
आदमीयत नही तो क्या
आदमी तो है ना ।
भेङिये सा खूँखार
सियार सा चतुर
कौवे सा काला
साँप सा कृतघ्न
कितना बहुआयामी
बन गया है
आदमी ।
(2)
पढकर अखबार मेँ
मृतकोँ की संख्या
एक आदमी
कहता है-
जनसंख्या फिर भी बढ रही है ।
(3)
ना उसे कोई बुरा कहता है
ना किसी को वो बुरा कहता है
आदमीयत नही तो क्या
आदमी तो है ना ।
Wednesday, 3 April 2013
काश ! ये मुमकिन होता
आते ही होली का दिन
निकल पङतेँ हैँ सब
अपने-अपने घरोँ से
लिये हाथोँ मेँ अनगिनत रंग
और हर्षित मन ।
गुलाल से भरे चेहरोँ की
नही रहती कोई जात
ना कोई धर्म
त्वचा का रंग भी नही रहता
काला या गौरा ।
घर के कोने मेँ
रंगोँ से सराबोर
अपना सतरंगी चेहरा लिये
सोचता हूँ-
भले एक दिन के लिये ही सही
काश ! ऐसा मुमकिन होता
कि डालकर इक-दूजे पर प्रेम रंग
हम अपने दिलोँ को भी कर पाते
होली के दिन सा
इक सार ।
निकल पङतेँ हैँ सब
अपने-अपने घरोँ से
लिये हाथोँ मेँ अनगिनत रंग
और हर्षित मन ।
गुलाल से भरे चेहरोँ की
नही रहती कोई जात
ना कोई धर्म
त्वचा का रंग भी नही रहता
काला या गौरा ।
घर के कोने मेँ
रंगोँ से सराबोर
अपना सतरंगी चेहरा लिये
सोचता हूँ-
भले एक दिन के लिये ही सही
काश ! ऐसा मुमकिन होता
कि डालकर इक-दूजे पर प्रेम रंग
हम अपने दिलोँ को भी कर पाते
होली के दिन सा
इक सार ।
कवि की तमन्ना
जुस्तजू नही है मुझे
लिखूं मैँ प्रेम पत्र
अपनी माशूका को,
ना तमन्ना है मुझे
गाऊँ मैँ नग़मेँ
किसी का प्यार पाने की खातिर ।
मेरे खुदा
इतनी रहमत करना
जब तक सांसेँ है,
चलती रहे कलम मेरी,
निकलती रही जुबां से
आवाज मेरी,
ताकि दिखा सकूं राह किसी पथ विचलित को,
दे सकूं शब्द किसी शोषित की पीङा को,
बाँटकर उपहार अपने ज्ञान का,
फैला सकूं सर्वत्र
शिक्षा का उजियारा ।
लिखूं मैँ प्रेम पत्र
अपनी माशूका को,
ना तमन्ना है मुझे
गाऊँ मैँ नग़मेँ
किसी का प्यार पाने की खातिर ।
मेरे खुदा
इतनी रहमत करना
जब तक सांसेँ है,
चलती रहे कलम मेरी,
निकलती रही जुबां से
आवाज मेरी,
ताकि दिखा सकूं राह किसी पथ विचलित को,
दे सकूं शब्द किसी शोषित की पीङा को,
बाँटकर उपहार अपने ज्ञान का,
फैला सकूं सर्वत्र
शिक्षा का उजियारा ।
Tuesday, 2 April 2013
एक मुक्तक
चेहरा है मासूम पर समझ सारी रखता हूँ,
हूँ बेशक तन्हा पर सफर जारी रखता हूँ ।
जाने क्योँ इतराते है यहाँ हुस्न वाले सदा,
मैँ फकीर तो नही पर दुनियाँ से यारी रखता हूँ ।
हूँ बेशक तन्हा पर सफर जारी रखता हूँ ।
जाने क्योँ इतराते है यहाँ हुस्न वाले सदा,
मैँ फकीर तो नही पर दुनियाँ से यारी रखता हूँ ।
Subscribe to:
Comments (Atom)