आते ही होली का दिन
निकल पङतेँ हैँ सब
अपने-अपने घरोँ से
लिये हाथोँ मेँ अनगिनत रंग
और हर्षित मन ।
गुलाल से भरे चेहरोँ की
नही रहती कोई जात
ना कोई धर्म
त्वचा का रंग भी नही रहता
काला या गौरा ।
घर के कोने मेँ
रंगोँ से सराबोर
अपना सतरंगी चेहरा लिये
सोचता हूँ-
भले एक दिन के लिये ही सही
काश ! ऐसा मुमकिन होता
कि डालकर इक-दूजे पर प्रेम रंग
हम अपने दिलोँ को भी कर पाते
होली के दिन सा
इक सार ।
No comments:
Post a Comment