Wednesday, 3 April 2013

काश ! ये मुमकिन होता

आते ही होली का दिन
निकल पङतेँ हैँ सब
अपने-अपने घरोँ से
लिये हाथोँ मेँ अनगिनत रंग
और हर्षित मन ।

गुलाल से भरे चेहरोँ की
नही रहती कोई जात
ना कोई धर्म
त्वचा का रंग भी नही रहता
काला या गौरा ।

घर के कोने मेँ
रंगोँ से सराबोर
अपना सतरंगी चेहरा लिये
सोचता हूँ-

भले एक दिन के लिये ही सही
काश ! ऐसा मुमकिन होता
कि डालकर इक-दूजे पर प्रेम रंग
हम अपने दिलोँ को भी कर पाते
होली के दिन सा
इक सार ।

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