Wednesday, 10 April 2013

कलियुग की पराकाष्ठा

समस्त संवेदनायेँ
हो चुकी मृत,
खोखले हो चुके है
आदर्श,
ढीले पङ चुके है तार
संस्कारोँ के,
दम तोङ रही है प्रबल आस्थायेँ ।

कुंठित हो रहे है
भावुक इंसान,
घुट-घुटकर मर रहे है
दौलत के बोझ से देवता,
सङकोँ पर नंगे नाचते हैँ हत्यारेँ
बनाकर मौत को अपनी दुल्हन,
जिन्दा ही दफन कर दी गयी है
मानवीयता ।

ये कलियुग की पराकाष्ठा है
अथवा
हमारा नैतिक पतन ?
क्या अब भी कुछ होना बाकी है ?
हमारा जिन्दा लाशेँ बनना बाकी है ?

अगर हाँ
तो बैठ जाईये घुटने टिकाकर
देखते रहिये तमाशा
इस मार्मिक सर्कस का ।

और यदि ना है
तो हो जाईये खङे मेरे संग
विरोध मेँ,
ताकि जिन्दा रह सके,
इंसानियत
और बचायी जा सके
मासूमियत ।

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