जुस्तजू नही है मुझे
लिखूं मैँ प्रेम पत्र
अपनी माशूका को,
ना तमन्ना है मुझे
गाऊँ मैँ नग़मेँ
किसी का प्यार पाने की खातिर ।
मेरे खुदा
इतनी रहमत करना
जब तक सांसेँ है,
चलती रहे कलम मेरी,
निकलती रही जुबां से
आवाज मेरी,
ताकि दिखा सकूं राह किसी पथ विचलित को,
दे सकूं शब्द किसी शोषित की पीङा को,
बाँटकर उपहार अपने ज्ञान का,
फैला सकूं सर्वत्र
शिक्षा का उजियारा ।
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