कनाडा के सुप्रसिद्ध कवि लियोनॉर्ड कॉहेन लिखते हैं-"कविता जिन्दगी का प्रमाण है | यदि आपकी जिन्दगी ठीक से जल रही है, तो बची हुई राख ही कविता है |" शायद यही कारण है कि किसी कवि द्वारा भोगे हुए अनुभवों को जब शब्दों की माला में पिरोया जाता हैं, तो पैदा हुई कविता हर पाठक को अपनी सी लगती है | वातानुकूलित कमरों में बैठकर कविताएं तो लिखी जा सकती हैं, लेकिन वे पाठक को अपने साथ जोड़कर उसकी पीड़ा को कम नही कर सकती | कविता की विषय वस्तु क्या हो-काल्पनिक, सुनी-सुनाई अथवा स्वयं भोगी हुई | स्वाभाविक रूप से अंतिम प्रकार की विषयवस्तु ही किसी रचना को कालजयी बनाती है और वही रचना पाठकों के हृदय पटल पर चिरकाल तक अंकित रहती है |
अनेक स्वनाम धन्य राजस्थानी साहित्यकारों की समृद्ध काव्य परंपरा का एक नया सितारा है-राजु सारसर 'राज', जिनके प्रथम कविता संग्रह 'म्हारै पांती रा सुपनां' को पढते हुए ये उम्मीद प्रगाढ़ होती है कि नई पीढी के कवियों में भी सराहनीय परिपक्वता है | राजु सारसर 'राज' की रचनाओं की प्रासंगिकता इस वजह से भी बढ जाती है कि वे किसी काल्पनिक प्रेम अथवा स्वयं के सुखद भविष्य के सपनों पर कलम चलाने की बजाय रोटी के लिए जूझते लोगों की पीड़ा को अपनी कविताओं में ढालते हैं | संग्रह की कविताओं से गुजरते हुए पाठक स्वत: यह महसूस करने लगता है कि ये राजु सारसर 'राज' की कविताएं न होकर समाज के शोषितों का सामूहिक बयान है | हिन्दी माध्यम में पढे-लिखे नव लिखारे राजस्थानी में लेखन के समय जिस भाषाई कच्चेपन से जूझते हैं, वो 'राज' की कविताओं से कोसो दूर लगता है | राजस्थानी परिवेश से गहराई से जुड़े होने का ही परिणाम है कि कवि शिल्प की कसौटी पर खरा उतरते हुए बड़ी सहज भाषा में अपनी बात को बड़ी कलात्मकता के साथ पाठकों के समक्ष रखने में सफल हुआ है | कविताओं में आंतरिक लय का निर्वाह और लोक से जुड़ी शब्दावली तो सराहनीय है ही, यमक और श्लेष जैसे अलंकारों का प्रयोग शिल्प सौन्दर्य को चार चाँद लगाता है |
सदियों से मौन रहकर शोषण सहन करते आये लोगों से नवसृजन का आह्वान करते हुए कवि 'हिवड़ै री हूक' कविता में लिखता है-"सुण/हिवड़ै रा पट खोल/कीं न कीं तो बोल/सुण इण अंधारै रो/ओ लांबौ मून/इणनै अब तोड़ |"
कुटिल सामंती मनोवृत्ति के सेठ-साहुकारों के अत्याचारों की विभीषिका का भी ज्यों कवि खुद प्रत्यक्षदर्शी रहा हो | कविता 'कदै तांई' की ये पंक्तियाँ बेहद मार्मिक हैं-"नैणां रा समंदर सूकग्या/काची काया होगी पाखाण/ईं उमर रा उडणा सुपनां/बापड़ै सुखियै नै कींकर भावै/आधो भूखो नींद मांय उरणावै/पसवाड़ो फेरै/होठ हालै/जाणै/बो तो नींद मांय रोटी खावै |"
शोषण की पीड़ा से गुजरते हुए आम आदमी के सुनहरे भविष्य के सपने भी कवि देखता है, लेकिन उनके पूरे न हो पाने के मलाल को फिर यूँ बयां करता है-"लोई झयाण होय'र/मरणासण/पड्या बाट न्हालै/छेहळी हेली री/म्हारै पांती रा सुपनां |"
इसी तरह भूख बापड़ी, कमजोरां नै मार, माजणो, घेर, मून, हार-जीत, फरक आदि इसी श्रृंखला की बेजोड़ कविताएं हैं |
गृहस्थी का दूसरा पहिया कहलाने वाली नारी के प्रति दोगले व्यवहार और आये दिन होने वाले शोषण से आहत कवि 'डूंगी डीक' कविता में लिखता है-"सूंई छाती झेलती/अंतस रो दरद/नीसरै बीनण्यां/जकी है किणी रै घर री/बै'न बेटी/म्हूं देखणो पण नीं चावूं/देखूं पण रोजीनां |"
धरम अर धरती, कळजुग, कांई, वरदान आदि कविताएं समाज में व्याप्त अंधविश्वासों के साथ-साथ-साथ धर्मान्धता पर भी गहरी चोट करती हैं | 'आस्था' कविता की ये पंक्तियाँ ध्यातव्य हैं-"मिंदरा-मसीतां-गिरजां मांय/माथौ निवावणै स्यूं ईं फगत/कोई नीं बण जावै आसतिक/हो जावै पण मिनख/संकड़ै दायरै में कैद |"
आधुनिकीकरण की अंधी दौड़ ने गांवों के वातावरण को किस प्रकार नकारात्मक ढंग से प्रभावित किया है, इसकी बानगी हमें आदमी, गाँव, विकास, गरब, अंदेसो, लखण, डर आदि कविताओं में देखने को मिलती है | कविता सै'र की ये पंक्तियाँ शहरीकरण के खोखलेपन को उजागर करती हैं-"सड़का लीलगी/माटी री सौरम/घर बणग्या/कैदखानां मिनखां सारू/हेत रा तारां नैं/निगळग्यो/बेतारां रो अंतरजाळ |"
गाँव से लेकर वैश्विक स्तर पर हथियारों की अंधी दौड़ के प्रति चिंता जताते हुए देश में पसरी प्रशासनिक भ्रष्टता और राजनीतिक अशिष्टाचार भी कुछ कविताओं की विषय वस्तु बनती हैं | संग्रह की अंतिम कविता आम आदमी में कवि लिखता है-"बनराय में/बांस रा रुंखा रै/आपसरी में रगड़का खाय'र/लाग्योड़ै बड़वानळ में/ज्यूं बळ जावै/बापड़ी निबळी दूब/बिंया रा बिंया ईं बळै/आम आदमी रा सुपनां/सत्ता रै रगड़का सूं |"
कविता संग्रह को पढना शुरु कर ज्यों-ज्यों पाठक अंत की तरफ पहुँचता है, त्यों-त्यों कवि का कद बढता हुआ महसूस होता है | नि:संदेह इस कविता संग्रह ने न केवल राजस्थानी काव्य को समृद्ध किया है, बल्कि ये विश्वास भी पैदा किया है कि राजस्थानी साहित्य नये रचनाकारों के हाथों में नई ऊँचाईयों को छू लेगा |
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म्हारै पांती रा सुपनां (राजस्थानी कविता संग्रह)/राजु सारसर 'राज'/पृष्ठ 112/मूल्य 100 रुपये/बोधि प्रकाशन,जयपुर
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-बी.एल.'पारस'
श्रीगंगानगर (राज.)