Sunday, 16 October 2016

समाज सुधार की पहेली

एक बार एक चित्रकार ने शानदार चित्र बनाया | फिर ये सोचकर कि इसे और बेहत्तर बनाऊँ, उसने लोगों कि प्रतिक्रियायें जानने का फैसला किया | बीच बाजार में एक चौराहे पर चित्र लगाकर उसने लिखा कि इस चित्र में कोई एक कमी बताये | जो भी राहगीर उस सड़क से
गुजरता, कुछ देर उत्सुकतावश चित्र को देखता और नीचे एक कमी लिख देता | शाम को जब चित्रकार लौटा, तो उसने देखा कि उस शानदार चित्र के बारें में सैंकड़ो कमियां लिखी हुई हैं | चित्रकार की उत्सुकता और बढ गई | उसने अगली शाम वही चित्र उसी चौराहे पर लगाया और लिखा कि इस चित्र को और सुंदर बनाने हेतु एक उपाय सुझाये | सड़क से गुजरने वाले राहगीर उस चित्र को देखते और अच्छा बताते हुए आगे निकल जाते | शाम को जब चित्रकार लौटा, तो उसे आश्चर्य हुआ कि चित्र को अच्छा बनाने हेतु एक भी उपाय
नही लिखा हुआ है |

ठीक यही स्थिति हमारे समाज की है | यदि पूरे समाज को एक चित्र और नागरिकों को राहगीर मान लिया जाये, तो स्थति पूर्णतया स्पष्ट हो
जायेगी | समाज में कुरीतियां हैं, समाज अशिक्षित है, समाज नशे का शिकार है, समाज धार्मिक अंधविश्वासों और कर्मकाण्डों से प्रताड़ित है, समाज के लोग जागरूक नही हैं, जैसी ढेरों समस्याओं का जिक्र प्रत्येक व्यक्ति अपने वक्तव्य में करता है, लेकिन इन तमाम समस्याओं का समाधान कोई बताने में सक्षम नही और यदि कोई बता भी दे, तो उसे स्वीकार कर एकमत हो क्रियान्वित करने का सामर्थ्य हम में नही है | यद्यपि गाँव की चौपाल से लेकर महानगरों तक समाज के नाम पर ठेकेदारी करने वाले तथाकथित 'जोड़ू-बटोड़ू' नेताओं की कोई कमी नही हैं, लेकिन बाबा साहब प्रदत्त संवैधानिक अधिकारों के बावजूद भी समाज सुधार एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है | नेपोलियन ने कहा था-"यदि सौ कुत्तों की फौज का नेतृत्व एक शेर और सौ शेरों की फौज का नेतृत्व एक कुत्ता करें, तो कुत्तों की फौज जीत जायेगी |" क्या हमारे समाज में ऐसा कोई
शेर है, जो समाज के माथे पर लगे पिछड़ेपन के
कलंक को मिटाकर सामाजिक उत्थान की इस
लड़ाई को अंजाम तक पहुँचा सके  ? वर्तमान
हालातों को देखते हुए मुझे नही लगता कि इसका उत्तर सकारात्मक है | हाँ, कुछ लोग शाम को अंग्रेजी या देसी शराब के चार पैग लगाकर जरूर शेर बन जाते होंगें और देर रात तक अपने बीवी-बच्चों अथवा पड़ौसी पर गुर्राते होंगें | फिर जब सुबह कोई उधार के पैसे माँगने आता होगा,
तो रजाई में मुँह छिपाकर सोने का बहाना करते
हुए ये भीगी बिल्ली बन जाते होंगे | विश्व के
सर्वश्रेष्ठ धम्मग्रंथ 'बुध्द और उनका धम्म' में
परम पूज्य बाबा साहब लिखते हैं-"पहले अपने
आप को ठीक मार्ग पर लगायें, तब दूसरों
को उपदेश दें |"

समाज के पिछड़े लोगों के उत्थान की जिम्मेदारी का निर्वहन समाज के जिस बुद्धिजीवी वर्ग को 'पे बैक टू सोसायटी' सिद्धांत के अनुसार करना
चाहिए था, वो ठीक ढंग से नही कर पाया और न वर्तमान में कर पा रहा है | एक बार  यूनान के सुप्रसिद्ध शासक मीनाण्डर ने संपूर्ण विश्व के विद्वानों को अपने प्रश्नों के जवाब देने की चुनौती दी | बौद्ध भिक्खु भंते नागसेन ने मीनाण्डर के सभी प्रश्नों के संतोषजनक जवाब दिये | मीनाण्डर का एक प्रश्न हमारे समाज के संदर्भ में बेहद प्रासंगिक है | उसने पूछा-"भंते ! कोई धम्म लुप्त क्यों हो जाता है  ?" भंते नागसेन ने जवाब दिया-"हे राजन  ! किसी धम्म के लुप्त हो जाने के तीन कारण हैं-पहला, जब धम्म के
सिद्धांत और शिक्षायें जनता की पहुँच
से दूर हो जाये | दूसरा, जब धम्म के सिद्धांत और शिक्षाओं को जनता की आवाज में जनता
तक पहुँचाने वाले लोग नही हो | तीसरा, जब धम्म के सिद्धांत और शिक्षाओं को आचरण में न उतारा जाये |" हमारे समाज के साथ भी ठीक
यही हुआ है | हमारा गौरवशाली अतीत और
परंपरायें हमसे दूर हुई, समाज पिछड़ता गया |
हमारे गौरवशाली अतीत और परंपराओं को हमारी भाषा में हम तक पहुँचाने वाला कोई
बुद्धिजीवी नही आया, समाज पिछड़ता गया |
हमारे गौरवशाली अतीत और परंपराओं को हमने अपने आचरण में नही उतारा, समाज पिछड़ता गया | आज न तो हम अपने गौरवशाली इतिहास से परिचित है और न अपनी
प्राचीन परंपराओं से | ऐसे हालातों में समाज सुधार का राग एक भद्दा मजाक बनकर रह
गया है |

'अपने आदर्शों को आचरण में उतारें' पुस्तक में धम्मभूमि आंदोलन के संयोजक और भारत के क्रांतिकारी भिक्खु श्रद्धेय भंते डॉ.करूणाशील 'राहुल' लिखते हैं-"यदि अँधेरे को खत्म करना है, तो अँधेरा-अँधेरा चिल्लाने से अँधेरा खत्म नही होगा, मंत्रों का जाप करने से अँधेरा खत्म नही होगा, लंबे-लंबे भाषणों से अँधेरा खत्म नही
होगा, बल्कि हमें प्रकाश की व्यवस्था करनी होगी |"
क्या हम समाज में पसरे बुराईयों-कुरीतियों रूपी
अँधेरे को दूर करने हेतु रचनात्मक काम रूपी प्रकाश की व्यवस्था कर पाये  ? यदि छूछक,भात, दहेज, मृत्युभोज जैसी सामाजिक कुरीतियां समाज को गरीब और गुलाम बनाये हुए थी, तो क्या हमें घर-घर जाकर इनके
प्रति जागृति पैदा कर इनका परित्याग कर अन्य
वैकल्पिक व्यवस्था को आत्मसात नही
कर लेना चाहिए था  ? यदि समाज नशे से
पीड़ित था, तो क्या हमें गाँव-गाँव में नशा
मुक्ति और नशा जन जागृति शिविरों का आयोजन नही करना चाहिए था  ? क्या समाज
के चिकित्सक वर्ग को इस क्षेत्र में अपनी सेवायें समाज हित में उपलब्ध नही करवानी चाहिए
थी  ? यदि समाज अशिक्षा का शिकार है,
तो क्या हमें राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले की तरह स्वयं की शिक्षा व्यवस्था का निर्माण नही कर लेना चाहिए था  ? क्या हमें पढे-लिखें बच्चों हेतु करियर काउंसलिंग की व्यवस्था नही
करनी चाहिए थी  ? क्या हमें प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे निर्धन प्रतियोगियों की सहायता हेतु नि:शुल्क कॉचिंग सेंटर प्रत्येक जिला मुख्यालय पर आरंभ नही कर देने चाहिए थे  ? क्या हमें शहरों में रह रहे  विद्यार्थियों हेतु
छात्रावासों की स्थापना नही कर  देनी चाहिए थी  ? यदि गरीबी हर घर की स्थाई मेहमान बनी
हुई थी, तो क्या हमें लोगों को व्यवसाय प्रशिक्षण नही देना चाहिए था, ताकि वे दिहाड़ी-मजदूरी
छोड़कर स्व व्यवसाय कर सकें   ? क्या हमें अपने समाज बांधवों को लघु उद्योगों की स्थापना हेतु नैतिक और आर्थिक समर्थन
नही देना चाहिए था  ? यदि वर्तमान धर्म हमें पंगु बनाकर हमारे स्वाभिमान को ठेस पहुँचा रहा था, तो क्या हमें बाबा साहब का दिखाया समतामूलक और स्वाभिमानी बुद्ध का धम्म अात्मसात् नही कर लेना चाहिए था  ? यदि इन प्रश्नों का जवाब हाँ है, तो नि:संदेह आप समाज सुधार की अबूझ पहेली की गाँठें खोलने में
सफल हो सकते हैं  |

खुद को समाज का सबसे बड़ा नेता दिखाने
की चाह में हम ये भूल जाते हैं कि हम समाज के भविष्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं | जब तक आपसी विचार-विमर्श द्वारा एक सार्थक योजना का निर्माण कर उसकी बेहत्तर ढंग से क्रियान्विति नही की जाती, तब तक समाज सुधार के ख्वाब देखना और दिखाना समाज को गुमराह करने से ज्यादा कुछ नही है | राजेंद्र बौद्ध अपने निबंध 'लक्ष्य प्राप्ति में असफल होते संगठन' में लिखते हैं-"यदि जीवन में लक्ष्य के
अँगूर न मिले, तो ये मत कहें कि अँगूर खट्टे थे,
बल्कि इस सच्चाई को स्वीकार करें कि मेरी छलांग छोटी थी और अगली बार अपनी छलांग को बड़ा करे | यदि लक्ष्य तक हाथ न पहुँचे, तो हाथ को और आगे बढाये, यदि आँखें लक्ष्य को न देख पा रही हो, तो आँखों को और खोले, यदि कान लक्ष्य की आहट न सुन पा रहे हो, तो
कानों को और ज्यादा सुनने का प्रशिक्षण दें |"
व्यक्तिगत स्तर पर किये गये छोटे-छोटे प्रयासों
की अपेक्षा सामूहिक प्रयासों के परिणाम
और प्रभाव व्यापक व स्थाई होते हैं | भारत के 15 राज्यों के लगभग 150 जिलों में सफलतापूर्वक संचालित धम्मभूमि आंदोलन इसका अनुकरणीय उदाहरण है | अत:
समाज सुधार के कॉपी-पेस्ट मापदण्डों से
बाहर निकल कर सकारात्मक और विस्तृत दृष्टिकोण का सृजन कर स्वयं को किसी राष्ट्रव्यापी संगठन की हिस्सा बनायें, समाज की दशा और दिशा दोनों बदल जायेगी |
-बी.एल.'पारस'
धम्मभूमि राजस्थान

Saturday, 15 October 2016

मर गया क्या आदमी ?

बीच सड़क टकराई एक बाईक
गलत दिशा से आती जीप से
पसर गये कुछ जिस्म
सड़क की काली छाती पर
छोड़ते हुए लाल निशान,
पल भर को रुके कुछ राहगीर
चल दिये फिर मुँह फेर कर,
किसी ने पूछा-
मर गया क्या आदमी  ?
मेरे अंदर से आवाज आई-
जिंदा है वो आदमी
जो धड़क रहा है बीच सड़क,
मर तो हम सब गये हैं
जो कर रहे हैं अनदेखा उसे |

ग़ज़ल

बोलते जो  बोलने दे,
आग में भी झोंकने दे |

भींचकर जो होठ बैठे,
सच सुना,फिर चौंकने दे |

ये कुत्ते काट नही सकते,
भौंकतें हैं, भौंकने दे |

झोंपड़ी को ले उड़ेगी,
आँधियों को रोकने दे |

तान के सर झूठ खड़ा
रुक ! मुझको टोकने दे |

प्यार करता हूँ कि नही,
रात भर तो सोचने दे |

Friday, 14 October 2016

अपना आदर्श तय करो/राजेन्द्र बौद्ध

कोई भी समुदाय या वर्ग जब एकता की बात करता है,एक जाजम पर बैठने की बात करता है,तो उसे सबसे पहले सामाजिक एवं धार्मिक एकता की आवश्यकता पड़ती है |
यदि कोई समाज सामाजिक एवं धार्मिक एकरुपता की भावना को नजरअंदाज करता है,तो वह छिन्न भिन्न हो जाता है | ऐसे में  विभिन्न मत-मतान्तरो के लोग कोई निर्धारित बड़ा लक्षय प्राप्त नही कर पाते  और अलग -अलग गुटों में कभी न खत्म होने वाला संघर्ष करते रहते हैं | कालांतर मे यही गुट पृथक्क पृथक्क समूहों, जातियों अथवा वर्गो  मे बंटकर घाघ राजनेताओ, चालबाजो व स्वार्थी लोगो के हाथों की कठपुतली बन जाते है | ये गुट इस बात से अनभिज्ञ रहते  है कि इस प्रकार की नादानी से  स्वंय के समाज का कितना बड़ा नुकसान कर रहे है ? यदि ये विभिन्न गुट अपनी संकीर्णता छोड़ दूरदर्शिता से मनन करे ,तो समाज विकास व सम्मान के असंख्य मार्ग स्वत: ही खुल जायेंगें |

सिक्ख समुदाय का ज्यादा पुराना इतिहास नही है, किंतु गुरु गोविंद सिह ने राजनैतिक शक्ति से पहले सामाजिक व धार्मिक रुप से अपने समस्त अनुयायियों को एक ही जाजम पर एकत्रित कर उनकी आस्था व विश्वास को स्थिर किया और सबको एक ही आदेश मानने का उपदेश दिया |  हम आज भी देख सकते है कि  श्री अकाल तख्त साहिब,अमृतसर से समस्त सिक्ख समुदाय संचालित होता है | मुख्यमंत्री, प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक अकाल तख्त मे हाजिरी देते है तथा गलती पर क्षमा याचना भी करते है | ठीक इसी  तरह से पूरी दुनिया की ईसाईयत वेटिकन सिटी के पोप से संचालित  होती है |
प्रत्येक ईसाई पोप के प्रति आस्थावान है और उसके आदेश की अनुपालना करता है |

अब यदि हम अपने समाज की बात करें,तो ये कड़वी सच्चाई है की हम कभी एक जाजम पर नही बैठ पाए | जाजम तो दूर, यदि घर मे एक चारपाई पर भी बैठ जाऐ,तो बिना वाद के खड़े नही होंगे | हम सबके सामाजिक रिवाज भिन्न है,धार्मिक मत भिन्न है | बड़े आश्चर्य की बात है कि एक ही जाति समुदाय के होने के बावजुद भी व्यावाहिरक भिन्नता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है | हमारी यही भिन्नता हमारे समग्र विकास मे मुख्य अवरोधक बनी हूई है | किसी की आस्था लाधुनाथ जी में, तो किसी की पाबूजी मे, कोई पल्लू की तीर्थ यात्रा पर जाता है, तो किसी को तौलियासर जाकर संतुष्टि  मिलती है | कोई रामदेवजी के परचो मे विश्वास रखता है, तो कोई धन-धन सतगुरु के दरबार में | कोई खुद को कबीरपंथी कहने मे गर्व महसूस करता है, तो कोई पितृ पूजा में | पूरी दुनिया मे ऐसी विसंगति का उदाहरण और कही नही मिलेगा, जहां एक ही समुदाय के लोग इतने मतों मे विभाजित हो |
हमारे समाज की उत्पति को लेकर भांति-भांति के मत है, किंतु ये सार्वभौंमिक सत्य है की जन्म से निश्चित हिंदू सामाजिक व्यवस्था के चार वर्णो -ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,और शूद्र में से हम जन्मजात  शूद्र हैं | कोई भी व्यक्ति लाख प्रयासो के बावजूद भी अपनी जाति अथवा वर्ण को बदल नही सकता | इसी जाति व्यवस्था के कारण आज भी लोग हमे हेय दृष्टि से देखते हैं |
हम अपने आप को कितना भी उच्च कहे, परंतु हमारे मानने या नही मानने से सच्चाई छिप नही सकती | अन्य लोग भले ही हमारी  उपस्थिति मे हमारी इज्जत करतें हो, मगर पीठ पीछे सजातिय लोगो के साथ हमारे लिये अपमानजनक संबोधनो से बाज नही आते | ऐसे लोगो के षड़यंत्र की वजह से ही हमारी सामाजिक एकता निरंतर खंडित हो रही है |
अब समय आ गया है कि हम सामाजिक और धार्मिक एकरुपता ग्रहण करते हुए, एक ही जाजम पर बैठते हूऐ दूरदर्शिता का परिचय देते हुए समाजोत्थान हेतु वांछित प्रयास करे | हमें  स्वयं की सामाजिक तथा धार्मिक स्थिति का सही ज्ञान करने की आवश्यकता है | हमें आज यह जानने की आवश्यकता है कि हमे जिस जाति प्रमाण पत्र का उपयोग शिक्षा,राजकीय सेवा,स्वास्थ्य सेवा  और राजनीति जैसे क्षेत्रों में कर रहे है, वो हमारी जाति की वजह से नही बल्कि  हमारे दलित-पिछड़े वर्ग के प्रतिनिधित्व के रुप मे  मिला  है | इस प्रतिनिधित्व का अधिकार हमे डॉ.आंबेडकर के साईमन कमीशन(1921), गोलमेज सम्मेलन(1929-31)और पूना पैक्ट(1932) में  कठोर विद्वतापूर्ण संघर्ष के प्रतिफल के रुप मे मिला है |

हमारे सामने कुछ जातियो के प्रत्यक्ष उदाहरण भी है, जिन्होने डॉ.आंबेडकर के प्रति आस्था रखते हुए उनको आदर्श स्वीकार किया, वे जातियां आज विकास की दौड़ मे सबसे आगे है | आज शासन प्रशासन,शिक्षा,व्यवसाय में इन्ही जातियो की भागीदारी अधिक है | हमारी व्यक्तिगत मान्यतायें चाहे कुछ भी हो, उन्हें दूसरो पर थोपने की बजाय विवेकशील बनकर एक विश्वव्यापी दृष्टिकोण अपनाते हूए,तर्कसम्मत सामाजिक,धार्मिक,शैक्षिक,आर्थिक,राजनीतिक हितैषी विचारो को नि:संकोच अपनाना चाहिऐ |
यदि आपको ये लगता है कि डॉ.आंबेडकर की विचारधारा और बुद्ध के धम्म से भी श्रेष्ठ अन्य मार्ग है, तो उसका निष्पक्ष तुलनात्मक अध्ययन कर पूरे समाज को एक जाजम पर लाकर उपयोगिता समझानी चाहिऐ | जो कुछ समाज हित में हो, उसे बिना समय व्यर्थ किये स्वीकार कर लेना चाहिऐ और फिर उसी के अनुरुप सारे समाज का सामाजिक और धार्मिक ढांचा संचालित होना चाहिऐ |

तुलनात्मक अध्यन और  सामूहिक निर्णय केे आधार पर एक बार निश्चित किये जाने के बाद सारे समुदाय को विचारधारा का अनुसरण करणा चाहिऐ | यही मजबूत आदर्श समाज का सर्वांगीण विकास करने मे सक्षम होगा, अन्यथा अपनी-अपनी राग की राह  पर चलते हूए लकीर का फकीर बने रहने से समाज सुधार रुपी मंजिल से हमारी दूरी यूँ ही बनी रहेगी |

बुद्धं शरणं गच्छामि

पहले तुमने कहा-
वेद पढने की सजा है जीभ कटना
हम चुप रहे,
फिर तुमने कहा-
मंदिरों में प्रवेश वर्जित है तुम्हारा
हम चुप रहे,
अब तुम कहते हो-
नीची जात के हो तुम सब
अब हम चुप नही रहेंगें,
गूँजेगा समवेत स्वर-
'बुद्धं शरणं गच्छामि' |